Saturday, October 12, 2019

Dholya Ganpati Wai



ढोल्या गणपति मंदिर। महागणपति मंदिर वाई। 



ढोल्या गणपति मंदिर यह महाराष्ट्र राज्य के सातारा जिला मे वाई शहर मे है । वाई शहर में यह मंदिर कृष्णा नदी के किनारे  पर बनाया गया है। इस मंदिर को महागणपति मंदिर भी कहा जाता है। वाई शहर का महत्व यानी  यह महाभारत कालीन प्राचीन शहर है। महाभारत समय मे इस शहर को विराट नगरी  कहा जाता था। ओर इस शहर को दक्षिण काशी भी कहा जाता है। दक्षिण कशी कहने का कारण यहाँ कृष्णा नदी के चारो ओर सात घाट है।

महागणपति मंदिर यानिकि ढोल्या गणपति मंदिर का निर्माण १७६२ साल मे श्री गणपतराव भीकाजी रास्ते इनकी ओर से गणपति आली घाट यहाँ कृष्णा नदी किनारे किया गया था। इस मंदिर की नींव से लेकर मंदिर के कलश तक की ऊचाई साधारण २४ मीटर इतनी है। साथ ही यह मंदिर कृष्णा नदी किनारे बनानेके कारण नदीपर बारबार आने वाले बाढ़ का विचार करके इस मंदिर की रचना केंद्र में त्रिकोणी मतलब मत्स्याकार बनायीं गयी है। इस निर्माण की विधि से मंदिर का बचाव कृष्णा नदीपर आने वाले बाढ़ से होता हे।
Krishna River
Krishna River Wai


और इस मंदिर के भितर की गणपति की मूर्ति यानिकि प्रतिमा कर्नाटक से लाये हुहे काले पत्थर में तराशी हुहि है। अभी इस गणपति प्रतिमा को केसरी रंग लगाया गया है। इस गणपति की प्रतिमा १० फुट लंबी ओर ८ फुट चौड़ी है। इस गणपति प्रतिमा का स्वरुप भव्य होनेके की वजह से इस गणपति को महागणपति ओर ढोल्या गणपति कहा जाता है। इस गणपति प्रतिमा की स्थापना वैशाख शु. १३ शके १६९१ में कियी गयी थी।

महागणपति मंदिर  के सामने काशी विश्वेश्वर का मंदिर है। महागणपति मंदिर का  शिखर वाई के सभी मंदिर से लंबा है। यह इस मंदिर की खासियत है। ओर इस मंदिर का निर्माण पत्थर में बहुत ही सुंदर किया गया है। इस मंदिर के बगल में धीरे बहनेवाली कृष्णा नदी के कारन इस जगह सुंदर ऐसा नज़ारा निर्माण हुहा है। यह महागणपति मंदिर की भीतर के गणपति वाई का ग्राम दैवत है।

इस मंदिर के भीतर की फोटो लेने केलिए कठोर मनाई होने के कारन हम अंदर की फोटो लेने में असमर्थ हुहे लेकिन हमने मंदिर के बहार की फोटो अवश्य लियी है नीचे देखे।

Dholya Ganpati Wai
Mahaganpati Mandir Wai


अगर आप कभी वाई शहर में आये तो इस मंदिर की यात्रा अवश्य करे। आपकी सभी मनोकामना ढोल्या गणपति जी अवश्य पूर्ण करेंगे।

अगर आपको इस मंदिर में आना होगा तो यातायात मार्ग इस प्रकार।

बस मार्ग

पुणे शहरसे  वाई ८८.५ किलोमीटर है।

सातारा शहरसे वाई ३५.८ किलोमीटर है।

ओर मुंबई , पुणे , सातारा शहर से प्राइवेट ओर MSRTC के बस हर रोज उपलब्ध होते है।

रेल्वे मार्ग 

सातारा रेल्वे स्टेशन से ४०.७ किलोमीटर

पुणे रेल्वे स्टेशन से ९१.५ किलोमीटर

खेड़ रेल्वे स्टेशन से ११० किलोमीटर

मुंबई रेल्वे स्टेशन से २३१ किलोमीटर

हवाई मार्ग 

मुंबई आंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा से २३८ किलोमीटर

पुणे आंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा से ९७.७ किलोमीटर

                                                                                                                                                                   
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Saturday, August 3, 2019

Pratapgad Fort


प्रतापगढ यह किला महाराष्ट्र के सातारा जिले मे महाबळेश्वर तालुका से २०.७ किलोमीटर अंतर पर जावळी घाटी मे सह्याद्रि पर्वत श्रृंखला मे छत्रपती शिवाजी महाराज के दूर दृश्टिकोण से बनाया गया है। जावळी घाटी मतलब दिनमे सूरज की किरणे जमीन तक नही पोहच पाती इतनी घनी झाडिया यहाँ है। जावळी यह प्रदेश छत्रपती शिवाजी महाराज के कब्जेमें आनेसे पहले विजापुर के आदिल शाह का सुभेदार चंद्रराव मोरे के कब्जेमें था। छत्रपती शिवाजी महाराज के द्वारा पहले चंद्रराव मोरे से पत्रव्यवहार और बातचीत करके स्वराज्य मे शामिल होकर हिंदवी स्वराज्य का विस्तार करने का प्रस्ताव रखा था पर चंद्रराव मोरे ने इस प्रस्ताव को नकार दिया था इसी कारण छत्रपती शिवाजी महाराज यिनोने ई.स १६५५ -१६५६ मे सूर्यराव काकडे ओर २००० सेना के साथ जावळी पर आक्रमण किया १ महीना युद्ध चला। छत्रपती शिवाजी महाराज के द्वारा चन्द्रराव मोरे का पराभव करके जावळी घाटी को कब्जेमे लिया इस वक्त छत्रपती शिवाजी महाराज का ध्यान जावळी के भोरप्या पहाड़ पर गया। इस पहाड़ का उपयोग उस वक्त मवेशी के चरने केलिए किया जाता था। उस पहाड़ की भौगोलिक ओर प्राकृतिक स्थिति को देखते हुहे छत्रपती शिवाजी महाराज ने अष्टप्रधान मंत्रिमंडल से मोरोपंत त्रिंबक पिंगळे ओर हिरोजी इंदोलकर (निर्माण प्रमुख) को इस पहाड़ पर किला बनाने का आदेश दिया। मोरोपंत पिंगळे ओर हिरोजी इंदोलकर के निगरानी के भीतर ई.स १६५६ मे इस किले का निर्माण की शुरुआत कियी थी।
ई.स १६५६ से लेकर १६५८ इस दो सालों के भीतर इस किले का निर्माण पूर्ण हुआ। इस किले के चारों और ५ किलोमीटर लंबाई की पत्थर की मजबूत दीवार बनायी गयी है।  इस किले का निर्माण चूना , गुड़ , शिसे , रेत का उपयोग करके पुरे पत्थर मे किया गया है। इस किले के प्रमुख द्वार का विशेष लक्षण यानी की जबतक आप इस किले की सीढ़ीया चढ़के द्वार के नजदीक नही जाते तबतक यह द्वार का मुख नही दीखता।

Pratapgad Fort
Pratapgad Pravesh Dwar

इस द्वार का मुख पश्चिम दिशा की और है। किले के ऊपर आक्रमण करनेके लिए आये हुये शत्रु को अधिक समय तक रोकनेके विचार हेतु इस द्वार की रचना कियी गयी है। द्वार के सामने वाले दीवार से द्वार के ऊपर सही नजर रखी जा सकती है। साथ ही तोफों का मारा और शत्रु के ऊपर हल्ला करनेकेलिए इस दीवार का निर्माण द्वार के सामने किया गया है। छत्रपती शिवाजी महाराज के समय से आज तक यह द्वार सूर्योदय से पहले खोला जाता है और सूर्यास्त के बाद यह द्वार बंद किया जाता है। किले के द्वार के भीतर प्रवेश करनेके बाद दाई ओर टेहळणी बुरुज (जिवा महाला बुरुज) है। इस बुरुज के ऊपर से किलेके चारो और दूर तक नजर रखी जा सकती है। इस बुरुज के ऊपर केसरी ध्वज स्तंभ फहराया है। द्वार के अंदर आने के बाद बायीं ओर राजे मार्ग (पालखी मार्ग ) है। छत्रपती शिवाजी महाराज जब इस किले पर आते थे तब राजे मार्ग तक घोड़े पर सवार हो कर आते थे यहासे आगे छत्रपती शिवाजी महाराज को पालखी मे बैठा कर शहनाई चौघडे बजाकर सन्मान से भवानी माँ के मंदिर मे लेकर जाते थे। किले मे भीतर आने के बाद भवानी माँ के मंदिर में जाने के लिए कुल २७५ सीढ़िया है यह सीढ़िया चढ़ते हुए दायीं ओर तालाब है इस तालाब की जगह पर किले की दीवार बनाने के लिए पत्थर निकालने की खान थी इस जगह पत्थर निकालते हुए पानी का झरना लगा ओर इस जगह तालाब बनाया गया।
Pratapgad Fort
Pratapgad Talab

 यह कुल २७५ सीढ़िया चढने के बाद भवानी माँ का मंदिर आता है इस मंदिर के भीतर की भवानी माँ की मूर्ति बनाने के लिए छत्रपती शिवाजी महाराज ने खास नेपाल में स्थित गंडकी नदी के किनारे पर से पत्थर मंगवाया कर बंबाजी नाईक इस मूर्तिकार से महिषासुरमर्दिनि रूप मे भवानी माँ की मूर्ति बनवाकर ली थी। ई.स १६६१ साल मे इस भवानी माँ की मूर्ति की स्थापना कियी थी। इस मंदिर मे छत्रपती शिवाजी महाराज के सरसेनापती हंबीरराव मोहीते की तलवार भवानी माँ की मूर्ति के सामने अब रखी गयी है। इस मंदिर के पीछे पैदल मार्ग है यहासे किले
नैऋत्य तलाव ओर चोर दरवाजा की ओर मार्ग जाता है। भवानी माँ का दर्शन लेने के बाद बालेकिले की सीढ़िया चढ़ते समय दायीं हाथपर श्री स्वामी समर्थ ने स्थापन किया हुआ हनुमान जी का मंदिर है। यहाँ से आगे बालेकिले का द्वार आता है इस द्वार की रचना गोमुख जैसी दिखती है। बालेकिले का महत्व यानी की शत्रू कम से कम समय मे किला कब्जेमे न ले इसी कारन किले के अंदर बनाया गया किला मतलब बालेकिला। बाले किले मे निवासियों के लिए पानी का ठिकान , अनाज का कोठार , घोडे की पागा , दारू गोळा कोठार यिन चीजोंकी सुविधा सुरक्षित जगह पर कियी जाती थी। इस बाले किले मे केदारेश्वर मंदिर है। केदारेश्वर मंदिर के जगह पर भवानी माँ का मंदिर बनाने वाले थे पर इस जगह काम करते समय मोरोपंत पिंगळे को शंकर भगवान की स्वयंभू मूर्ति मिली इसी कारन इस जगह पर केदारेश्वर मंदिर बनाया गया ओर बाले किले के निचे भवानी माँ का मंदिर बनाया गया। इस केदारेश्वर मंदिर के सामने छत्रपती शिवाजी महाराज का अष्टप्रधान मंत्री मंडल के  साथ दरबार भरता था। अफजल खान वध के दिन छत्रपति शिवाजी महाराज ने सुबह केदारेश्वर मंदिर मे शंकर भगवान को अभिषेक करके दरबार मे विचार वार्ता करने के बाद किले के निचे उतरे थे। केदारेश्वर मंदिर के पीछे केदारेश्वर बुरुज है साथ ही  इस किले के दक्षिण ओर उत्तर दिशाओं पर यशवंत बुरुज , रेडका बुरुज हैयिन दो बुरुजोके बीच मे नासके झील ओर गोड़े झील है।  किले के ऊपर बेताल मंदिर है भी है। इस किले पर सूर्य बुरुज ओर ३५४३ फुट लंबाई की कडेलोट ऐसी जगह है। किले के अंदर पीछे एक भूमिगत मार्ग है अगर कभी शत्रु ने किले मे प्रवेश किया तो इस भूमिगत मार्ग का उपयोग करके किले के बहार जाने की सुविधा है।

Pratapgad Fort
Pratapgad Yddha


जावळी घाटी का प्रदेश जब छत्रपती शिवाजी महाराज अपने ने कब्जेमे लेने के कारन विजापुर की आदिलशाही
पूर्ण रूप से हिल गयी और तभी विजापुर मे बड़ा दरबार लिया गया। विजापुर की बड़ी बेगम शहा ने शर्त रखी की जो कोही भी शिवाजी को गिरफ्तार करके या मारके आयेगा उसे बड़ी जहाँगीर ओर आदिलशही का वजीर बनाया जायेगा। कोही भी आगे आने के लिये तयार नही था तब दरबार मे "मै लाऊंगा शिवाजी को" ऐसे कहते हुए अफजल खान सामने आया और बड़ी बेगम शहा ने शर्त को हा कह दिया। अफजल खान शरीर से मजबूत और दिमाग से क्रूर था। अफजल खान के साथ ४०००० हजार की हाथी , ऊंट , घुड़सवार और पैदल सिपाही ऐसी फौज भेजी गयी। अफजल खान स्वराज्य पे चलके आया उसने तुळजापूर काबिज किया पंढरपुर की तबाही कियी ऐसे बहुत हिन्दू धर्म के पवित्र जगहों की तबाही कियी गांव लुटे उसका प्रमुख हेतु था की छत्रपती शिवाजी महाराज को खुले जगह लेके आना पर छत्रपती शिवाजी महाराज अफजल खान का हेतु जानते थे उनको पता था की अफजल खान के सामने खुले युद्ध भूमि में युद्ध करना बहुत ही कठिन ओर धोकादायक है इसी कारन छत्रपती शिवाजी महाराज ने गनिमी कावा युद्ध तकनीक से जावळी घाटी के जंगल मे प्रतापगढ किला के परिसर में युद्ध करने का निर्णय लिया। कारण इस परिसर में अफजल खान की हाथी , ऊंट , घुड़सवार ओर बंदूक इनका प्रयोग करना बहुत कठिन था। छत्रपती शिवाजी महाराज ने अफजल खान को जावळी घाटी में बुलाया। अफजल खान की सिर्फ १२,००० सैनिक ही जावळी घाटी तक पहुंच सके। दिनांक १० नवंबर १६५९ पर छत्रपती शिवाजी महाराज ओर अफजल खान की मिलने की जगह ओर समय तय हुवा। दोपहर को २ बजे छत्रपती शिवाजी महाराज ने अफजल खान का वध किया ओर अफजल खान की फौज का गनिमी कावा युद्ध तकनीक से मराठो के फौज ने पराभव किया। अफजल खान को मारनेके बाद छत्रपती शिवाजी महाराज को ओर मराठी जित को बड़ा प्रताप मिल गया इसी कारन इस किले का नाम प्रताप गड रखा गया।
Pratapgad Fort
Pratapgad Fort



   प्रतापगड किले पर बालेकिले मे छत्रपती शिवाजी महाराज का रहनेका राजवाड़ा था उसे ब्रिटिशोंने तोड़ दिया था। अभी उस जगह पर अभ स्टेचूगार्डन है यहाँ पर छत्रपती शिवाजी महाराज का कृष्णा घोड़ी पर बैठे हुवे अश्वारूढ़ मूर्ति है। यह मूर्ति पंच धातु से बनाया गया है इस मूर्ति की रचना मूर्तिकार रामचंद्र पांडुरंग कामत (विले पार्ले) इनकी सहयोग से बनाया गया है। इस मूर्ति का कुल वजन ४५० टन इतना है। यह मूर्ति १७ अलग अलग पार्ट में बनाया गया है।  यह १७ अलग पार्ट यहाँ लाकर आपस में जोड़े गए है। इस मूर्ति की कुल उचाई  नींव से ३६ फुट इतनी है ओर घोड़ी से लेकर तलवार की नोक तक कुल १६ फुट है। इस मूर्ति के बाजुमे तोपे रखी गयी है। इस मूर्ति का उद्घाटन ३० नवंबर १९५७ में भारत के पहले प्रधान मंत्री पंडित जवाहलाल नेहरू के हस्ते किया गया था। इस मूर्ति के निचे कुछ ऐतिहासिक वाक्य मराठी भाषा में लिखे गये है उनका हिंदी में अनुवाद इस प्रकार।


छत्रपती शिवाजी महाराज का मोगल अधिकारीयोको पत्र

"मेरे माय भूमीका रक्षण यह मेरा परम कर्तव्य है इस भूमी पर आक्रमण करने वाला कोही भी हो कभी भी सफल नही हुआ"

पोर्तुगीज गव्हर्नर गोवा इ.स. १६६६ 

"शिवाजी महाराज का शौर्य ओर कर्तृत्व इतना बड़ा है की उनकी तुलना जगज्जेता अलेक्झांडर से ही हो सकती है"


छत्रपती शिवाजी महाराज का आज्ञा पत्र 
Pratapgad Fort
Chatrapati Shivaji Maharaj Aadnyapatra




















Monday, March 25, 2019

Panchganga Mandir old Mahabaleshwar Maharashtra

श्री क्षेत्र महाबळेश्वर पंचगंगा मंदिर


पंचगंगा मंदिर यह महाराष्ट्र के सातारा जिला मे महाबळेश्वर से ६ किलोमीटर के पास श्री क्षेत्र महाबळेश्वर इस जगह है।  इस जगह की उचाई समुद्र के स्तर से साधारण १३७२  मीटर इतनी है।

पंचगंगा यह मंदिर साधारण ४५०० साल पहले का पुराना है। इस मंदिर का महत्व यानिकि इस जगह पांच नदियोंका जन्म यानिकि प्रारंभ हुआ है इस वजह से इस मंदिर को पंचगंगा मंदिर यह नाम दिया गया है।

इस पंचगंगा मंदिर हे कृष्णा , वेण्णा , कोयना , सावित्री , गायत्री इस नदियोंका पवित्र संगम किया गया है। ईन  पाचोही नदियोंका पानी एकसाथ आकर गोमुख से  कुंड में गिरता है। इस के अतिरिक्त इस जगह भागीरथी ओर सरस्वती यह दो नदिया गुप्त है। भागीरथी नदी हर १२ साल ओर सरस्वती नदी हर साठ  साल कृष्णा नदीको मिलने आती है।

प्राचीन कहानी के अनुसार इस जगह ब्रम्हा , विष्णु , महेश , सावित्री , ओर गायित्री यिन देवताओंका जलरूप मे उगम होनेका कहा जाता है।

पंचगंगा मंदिर के पीछे कृष्णाबाई नामका मंदिर है। इस मंदिर का निर्माण कोकण के राजे रत्नागिरी ओण द्वारा १८८८ हे किया था। इस मंदिर में कृष्ण भगवान की मूर्ति आवर शिवलिंग है।
इस मंदिर में छोटासा झरना गोमुख से कुंड में गिरता है।
इस मंदिर का निर्माण पूर्णरूपसे पत्थर में किया गया है। इस   नदीका सुन्दर दृश्य देखनेको मिलता है।


Panchganga Mandir | Tempal | पंचगंगा मंदिर
Panchganga Mandir | Tempal | पंचगंगा मंदिर


  • कृष्णा नदी महाराष्ट्र , कर्णाटक , आंध्र प्रदेश ऐसी यात्रा करके साधारण १३०० कि.मी का अंतर पर करके बंगाल के उपसागर को मिलती है। 
  • वेण्णा नदी संगम माहुली जगह पे कृष्णा नदीको मिलती है। 
  • कोयना नदी तपोला , येरवले ऐसी यात्रा करके करद में कृष्णा नदीको मिलती है। 
  • सावित्री नदी महाबळेश्वर शुरू होकर पच्छिम की ओर पोलादपुर , महाड , माणगाव , श्रीवर्धन ऐसी यात्रा करके हरिहेश्वर यहाँ अरबी समुन्दर को मिलती है। 
  • गायित्री नदी भी कृष्णा नदीको मिलती हैँ। 


  • अगर आप कभी महाबळेश्वर आवर पंचगनी इस जगह आतेहो तो पंचगंगा मंदिर को अवश्य भेट दे। 

                                                                                                                           

अगर आपको इस जगह आना होगा तो यातायात मार्ग इस प्रकार।

बस मार्ग।

वाई सातारा से महाबळेश्वर ३२ किलोमीटर है। 
सातारा शहर से  ४५ किलोमीटर है।
मुंबई , पुणे , सांगली , कोल्हापुर ओर सातारा से प्रायवेट बस आवर MSRTC के बस हर रोज उपलब्ध होती है।


रेलवे मार्ग।

नजदीक रेलवे स्टेशन इस प्रकार 
सातारा ६० किलोमीटर
खेड ६० किलोमीटर
पुणे १२० किलोमीटर
मुंबई २७० किलोमीटर

हवाई मार्ग।

पुणे अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा १२० किलोमीटर
मुंबई अंतरराष्ट्रीय विमानतळ २७० किलोमीटर

                                                                                                                                      
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Dholya Ganpati Wai

ढोल्या गणपति मंदिर। महागणपति मंदिर वाई।  ढोल्या गणपति मंदिर यह महाराष्ट्र राज्य के सातारा जिला मे वाई शहर मे है । वाई शहर में यह मंदि...