प्रतापगढ यह किला महाराष्ट्र के सातारा जिले मे महाबळेश्वर तालुका से २०.७ किलोमीटर अंतर पर जावळी घाटी मे सह्याद्रि पर्वत श्रृंखला मे छत्रपती शिवाजी महाराज के दूर दृश्टिकोण से बनाया गया है। जावळी घाटी मतलब दिनमे सूरज की किरणे जमीन तक नही पोहच पाती इतनी घनी झाडिया यहाँ है। जावळी यह प्रदेश छत्रपती शिवाजी महाराज के कब्जेमें आनेसे पहले विजापुर के आदिल शाह का सुभेदार चंद्रराव मोरे के कब्जेमें था। छत्रपती शिवाजी महाराज के द्वारा पहले चंद्रराव मोरे से पत्रव्यवहार और बातचीत करके स्वराज्य मे शामिल होकर हिंदवी स्वराज्य का विस्तार करने का प्रस्ताव रखा था पर चंद्रराव मोरे ने इस प्रस्ताव को नकार दिया था इसी कारण छत्रपती शिवाजी महाराज यिनोने ई.स १६५५ -१६५६ मे सूर्यराव काकडे ओर २००० सेना के साथ जावळी पर आक्रमण किया १ महीना युद्ध चला। छत्रपती शिवाजी महाराज के द्वारा चन्द्रराव मोरे का पराभव करके जावळी घाटी को कब्जेमे लिया इस वक्त छत्रपती शिवाजी महाराज का ध्यान जावळी के भोरप्या पहाड़ पर गया। इस पहाड़ का उपयोग उस वक्त मवेशी के चरने केलिए किया जाता था। उस पहाड़ की भौगोलिक ओर प्राकृतिक स्थिति को देखते हुहे छत्रपती शिवाजी महाराज ने अष्टप्रधान मंत्रिमंडल से मोरोपंत त्रिंबक पिंगळे ओर हिरोजी इंदोलकर (निर्माण प्रमुख) को इस पहाड़ पर किला बनाने का आदेश दिया। मोरोपंत पिंगळे ओर हिरोजी इंदोलकर के निगरानी के भीतर ई.स १६५६ मे इस किले का निर्माण की शुरुआत कियी थी।
ई.स १६५६ से लेकर १६५८ इस दो सालों के भीतर इस किले का निर्माण पूर्ण हुआ। इस किले के चारों और ५ किलोमीटर लंबाई की पत्थर की मजबूत दीवार बनायी गयी है। इस किले का निर्माण चूना , गुड़ , शिसे , रेत का उपयोग करके पुरे पत्थर मे किया गया है। इस किले के प्रमुख द्वार का विशेष लक्षण यानी की जबतक आप इस किले की सीढ़ीया चढ़के द्वार के नजदीक नही जाते तबतक यह द्वार का मुख नही दीखता।
इस द्वार का मुख पश्चिम दिशा की और है। किले के ऊपर आक्रमण करनेके लिए आये हुये शत्रु को अधिक समय तक रोकनेके विचार हेतु इस द्वार की रचना कियी गयी है। द्वार के सामने वाले दीवार से द्वार के ऊपर सही नजर रखी जा सकती है। साथ ही तोफों का मारा और शत्रु के ऊपर हल्ला करनेकेलिए इस दीवार का निर्माण द्वार के सामने किया गया है। छत्रपती शिवाजी महाराज के समय से आज तक यह द्वार सूर्योदय से पहले खोला जाता है और सूर्यास्त के बाद यह द्वार बंद किया जाता है। किले के द्वार के भीतर प्रवेश करनेके बाद दाई ओर टेहळणी बुरुज (जिवा महाला बुरुज) है। इस बुरुज के ऊपर से किलेके चारो और दूर तक नजर रखी जा सकती है। इस बुरुज के ऊपर केसरी ध्वज स्तंभ फहराया है। द्वार के अंदर आने के बाद बायीं ओर राजे मार्ग (पालखी मार्ग ) है। छत्रपती शिवाजी महाराज जब इस किले पर आते थे तब राजे मार्ग तक घोड़े पर सवार हो कर आते थे यहासे आगे छत्रपती शिवाजी महाराज को पालखी मे बैठा कर शहनाई चौघडे बजाकर सन्मान से भवानी माँ के मंदिर मे लेकर जाते थे। किले मे भीतर आने के बाद भवानी माँ के मंदिर में जाने के लिए कुल २७५ सीढ़िया है यह सीढ़िया चढ़ते हुए दायीं ओर तालाब है इस तालाब की जगह पर किले की दीवार बनाने के लिए पत्थर निकालने की खान थी इस जगह पत्थर निकालते हुए पानी का झरना लगा ओर इस जगह तालाब बनाया गया।
यह कुल २७५ सीढ़िया चढने के बाद भवानी माँ का मंदिर आता है इस मंदिर के भीतर की भवानी माँ की मूर्ति बनाने के लिए छत्रपती शिवाजी महाराज ने खास नेपाल में स्थित गंडकी नदी के किनारे पर से पत्थर मंगवाया कर बंबाजी नाईक इस मूर्तिकार से महिषासुरमर्दिनि रूप मे भवानी माँ की मूर्ति बनवाकर ली थी। ई.स १६६१ साल मे इस भवानी माँ की मूर्ति की स्थापना कियी थी। इस मंदिर मे छत्रपती शिवाजी महाराज के सरसेनापती हंबीरराव मोहीते की तलवार भवानी माँ की मूर्ति के सामने अब रखी गयी है। इस मंदिर के पीछे पैदल मार्ग है यहासे किले
नैऋत्य तलाव ओर चोर दरवाजा की ओर मार्ग जाता है। भवानी माँ का दर्शन लेने के बाद बालेकिले की सीढ़िया चढ़ते समय दायीं हाथपर श्री स्वामी समर्थ ने स्थापन किया हुआ हनुमान जी का मंदिर है। यहाँ से आगे बालेकिले का द्वार आता है इस द्वार की रचना गोमुख जैसी दिखती है। बालेकिले का महत्व यानी की शत्रू कम से कम समय मे किला कब्जेमे न ले इसी कारन किले के अंदर बनाया गया किला मतलब बालेकिला। बाले किले मे निवासियों के लिए पानी का ठिकान , अनाज का कोठार , घोडे की पागा , दारू गोळा कोठार यिन चीजोंकी सुविधा सुरक्षित जगह पर कियी जाती थी। इस बाले किले मे केदारेश्वर मंदिर है। केदारेश्वर मंदिर के जगह पर भवानी माँ का मंदिर बनाने वाले थे पर इस जगह काम करते समय मोरोपंत पिंगळे को शंकर भगवान की स्वयंभू मूर्ति मिली इसी कारन इस जगह पर केदारेश्वर मंदिर बनाया गया ओर बाले किले के निचे भवानी माँ का मंदिर बनाया गया। इस केदारेश्वर मंदिर के सामने छत्रपती शिवाजी महाराज का अष्टप्रधान मंत्री मंडल के साथ दरबार भरता था। अफजल खान वध के दिन छत्रपति शिवाजी महाराज ने सुबह केदारेश्वर मंदिर मे शंकर भगवान को अभिषेक करके दरबार मे विचार वार्ता करने के बाद किले के निचे उतरे थे। केदारेश्वर मंदिर के पीछे केदारेश्वर बुरुज है साथ ही इस किले के दक्षिण ओर उत्तर दिशाओं पर यशवंत बुरुज , रेडका बुरुज हैयिन दो बुरुजोके बीच मे नासके झील ओर गोड़े झील है। किले के ऊपर बेताल मंदिर है भी है। इस किले पर सूर्य बुरुज ओर ३५४३ फुट लंबाई की कडेलोट ऐसी जगह है। किले के अंदर पीछे एक भूमिगत मार्ग है अगर कभी शत्रु ने किले मे प्रवेश किया तो इस भूमिगत मार्ग का उपयोग करके किले के बहार जाने की सुविधा है।
जावळी घाटी का प्रदेश जब छत्रपती शिवाजी महाराज अपने ने कब्जेमे लेने के कारन विजापुर की आदिलशाही
पूर्ण रूप से हिल गयी और तभी विजापुर मे बड़ा दरबार लिया गया। विजापुर की बड़ी बेगम शहा ने शर्त रखी की जो कोही भी शिवाजी को गिरफ्तार करके या मारके आयेगा उसे बड़ी जहाँगीर ओर आदिलशही का वजीर बनाया जायेगा। कोही भी आगे आने के लिये तयार नही था तब दरबार मे "मै लाऊंगा शिवाजी को" ऐसे कहते हुए अफजल खान सामने आया और बड़ी बेगम शहा ने शर्त को हा कह दिया। अफजल खान शरीर से मजबूत और दिमाग से क्रूर था। अफजल खान के साथ ४०००० हजार की हाथी , ऊंट , घुड़सवार और पैदल सिपाही ऐसी फौज भेजी गयी। अफजल खान स्वराज्य पे चलके आया उसने तुळजापूर काबिज किया पंढरपुर की तबाही कियी ऐसे बहुत हिन्दू धर्म के पवित्र जगहों की तबाही कियी गांव लुटे उसका प्रमुख हेतु था की छत्रपती शिवाजी महाराज को खुले जगह लेके आना पर छत्रपती शिवाजी महाराज अफजल खान का हेतु जानते थे उनको पता था की अफजल खान के सामने खुले युद्ध भूमि में युद्ध करना बहुत ही कठिन ओर धोकादायक है इसी कारन छत्रपती शिवाजी महाराज ने गनिमी कावा युद्ध तकनीक से जावळी घाटी के जंगल मे प्रतापगढ किला के परिसर में युद्ध करने का निर्णय लिया। कारण इस परिसर में अफजल खान की हाथी , ऊंट , घुड़सवार ओर बंदूक इनका प्रयोग करना बहुत कठिन था। छत्रपती शिवाजी महाराज ने अफजल खान को जावळी घाटी में बुलाया। अफजल खान की सिर्फ १२,००० सैनिक ही जावळी घाटी तक पहुंच सके। दिनांक १० नवंबर १६५९ पर छत्रपती शिवाजी महाराज ओर अफजल खान की मिलने की जगह ओर समय तय हुवा। दोपहर को २ बजे छत्रपती शिवाजी महाराज ने अफजल खान का वध किया ओर अफजल खान की फौज का गनिमी कावा युद्ध तकनीक से मराठो के फौज ने पराभव किया। अफजल खान को मारनेके बाद छत्रपती शिवाजी महाराज को ओर मराठी जित को बड़ा प्रताप मिल गया इसी कारन इस किले का नाम प्रताप गड रखा गया।
प्रतापगड किले पर बालेकिले मे छत्रपती शिवाजी महाराज का रहनेका राजवाड़ा था उसे ब्रिटिशोंने तोड़ दिया था। अभी उस जगह पर अभ स्टेचूगार्डन है यहाँ पर छत्रपती शिवाजी महाराज का कृष्णा घोड़ी पर बैठे हुवे अश्वारूढ़ मूर्ति है। यह मूर्ति पंच धातु से बनाया गया है इस मूर्ति की रचना मूर्तिकार रामचंद्र पांडुरंग कामत (विले पार्ले) इनकी सहयोग से बनाया गया है। इस मूर्ति का कुल वजन ४५० टन इतना है। यह मूर्ति १७ अलग अलग पार्ट में बनाया गया है। यह १७ अलग पार्ट यहाँ लाकर आपस में जोड़े गए है। इस मूर्ति की कुल उचाई नींव से ३६ फुट इतनी है ओर घोड़ी से लेकर तलवार की नोक तक कुल १६ फुट है। इस मूर्ति के बाजुमे तोपे रखी गयी है। इस मूर्ति का उद्घाटन ३० नवंबर १९५७ में भारत के पहले प्रधान मंत्री पंडित जवाहलाल नेहरू के हस्ते किया गया था। इस मूर्ति के निचे कुछ ऐतिहासिक वाक्य मराठी भाषा में लिखे गये है उनका हिंदी में अनुवाद इस प्रकार।
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| Pratapgad Pravesh Dwar |
इस द्वार का मुख पश्चिम दिशा की और है। किले के ऊपर आक्रमण करनेके लिए आये हुये शत्रु को अधिक समय तक रोकनेके विचार हेतु इस द्वार की रचना कियी गयी है। द्वार के सामने वाले दीवार से द्वार के ऊपर सही नजर रखी जा सकती है। साथ ही तोफों का मारा और शत्रु के ऊपर हल्ला करनेकेलिए इस दीवार का निर्माण द्वार के सामने किया गया है। छत्रपती शिवाजी महाराज के समय से आज तक यह द्वार सूर्योदय से पहले खोला जाता है और सूर्यास्त के बाद यह द्वार बंद किया जाता है। किले के द्वार के भीतर प्रवेश करनेके बाद दाई ओर टेहळणी बुरुज (जिवा महाला बुरुज) है। इस बुरुज के ऊपर से किलेके चारो और दूर तक नजर रखी जा सकती है। इस बुरुज के ऊपर केसरी ध्वज स्तंभ फहराया है। द्वार के अंदर आने के बाद बायीं ओर राजे मार्ग (पालखी मार्ग ) है। छत्रपती शिवाजी महाराज जब इस किले पर आते थे तब राजे मार्ग तक घोड़े पर सवार हो कर आते थे यहासे आगे छत्रपती शिवाजी महाराज को पालखी मे बैठा कर शहनाई चौघडे बजाकर सन्मान से भवानी माँ के मंदिर मे लेकर जाते थे। किले मे भीतर आने के बाद भवानी माँ के मंदिर में जाने के लिए कुल २७५ सीढ़िया है यह सीढ़िया चढ़ते हुए दायीं ओर तालाब है इस तालाब की जगह पर किले की दीवार बनाने के लिए पत्थर निकालने की खान थी इस जगह पत्थर निकालते हुए पानी का झरना लगा ओर इस जगह तालाब बनाया गया।
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| Pratapgad Talab |
यह कुल २७५ सीढ़िया चढने के बाद भवानी माँ का मंदिर आता है इस मंदिर के भीतर की भवानी माँ की मूर्ति बनाने के लिए छत्रपती शिवाजी महाराज ने खास नेपाल में स्थित गंडकी नदी के किनारे पर से पत्थर मंगवाया कर बंबाजी नाईक इस मूर्तिकार से महिषासुरमर्दिनि रूप मे भवानी माँ की मूर्ति बनवाकर ली थी। ई.स १६६१ साल मे इस भवानी माँ की मूर्ति की स्थापना कियी थी। इस मंदिर मे छत्रपती शिवाजी महाराज के सरसेनापती हंबीरराव मोहीते की तलवार भवानी माँ की मूर्ति के सामने अब रखी गयी है। इस मंदिर के पीछे पैदल मार्ग है यहासे किले
नैऋत्य तलाव ओर चोर दरवाजा की ओर मार्ग जाता है। भवानी माँ का दर्शन लेने के बाद बालेकिले की सीढ़िया चढ़ते समय दायीं हाथपर श्री स्वामी समर्थ ने स्थापन किया हुआ हनुमान जी का मंदिर है। यहाँ से आगे बालेकिले का द्वार आता है इस द्वार की रचना गोमुख जैसी दिखती है। बालेकिले का महत्व यानी की शत्रू कम से कम समय मे किला कब्जेमे न ले इसी कारन किले के अंदर बनाया गया किला मतलब बालेकिला। बाले किले मे निवासियों के लिए पानी का ठिकान , अनाज का कोठार , घोडे की पागा , दारू गोळा कोठार यिन चीजोंकी सुविधा सुरक्षित जगह पर कियी जाती थी। इस बाले किले मे केदारेश्वर मंदिर है। केदारेश्वर मंदिर के जगह पर भवानी माँ का मंदिर बनाने वाले थे पर इस जगह काम करते समय मोरोपंत पिंगळे को शंकर भगवान की स्वयंभू मूर्ति मिली इसी कारन इस जगह पर केदारेश्वर मंदिर बनाया गया ओर बाले किले के निचे भवानी माँ का मंदिर बनाया गया। इस केदारेश्वर मंदिर के सामने छत्रपती शिवाजी महाराज का अष्टप्रधान मंत्री मंडल के साथ दरबार भरता था। अफजल खान वध के दिन छत्रपति शिवाजी महाराज ने सुबह केदारेश्वर मंदिर मे शंकर भगवान को अभिषेक करके दरबार मे विचार वार्ता करने के बाद किले के निचे उतरे थे। केदारेश्वर मंदिर के पीछे केदारेश्वर बुरुज है साथ ही इस किले के दक्षिण ओर उत्तर दिशाओं पर यशवंत बुरुज , रेडका बुरुज हैयिन दो बुरुजोके बीच मे नासके झील ओर गोड़े झील है। किले के ऊपर बेताल मंदिर है भी है। इस किले पर सूर्य बुरुज ओर ३५४३ फुट लंबाई की कडेलोट ऐसी जगह है। किले के अंदर पीछे एक भूमिगत मार्ग है अगर कभी शत्रु ने किले मे प्रवेश किया तो इस भूमिगत मार्ग का उपयोग करके किले के बहार जाने की सुविधा है।
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| Pratapgad Yddha |
जावळी घाटी का प्रदेश जब छत्रपती शिवाजी महाराज अपने ने कब्जेमे लेने के कारन विजापुर की आदिलशाही
पूर्ण रूप से हिल गयी और तभी विजापुर मे बड़ा दरबार लिया गया। विजापुर की बड़ी बेगम शहा ने शर्त रखी की जो कोही भी शिवाजी को गिरफ्तार करके या मारके आयेगा उसे बड़ी जहाँगीर ओर आदिलशही का वजीर बनाया जायेगा। कोही भी आगे आने के लिये तयार नही था तब दरबार मे "मै लाऊंगा शिवाजी को" ऐसे कहते हुए अफजल खान सामने आया और बड़ी बेगम शहा ने शर्त को हा कह दिया। अफजल खान शरीर से मजबूत और दिमाग से क्रूर था। अफजल खान के साथ ४०००० हजार की हाथी , ऊंट , घुड़सवार और पैदल सिपाही ऐसी फौज भेजी गयी। अफजल खान स्वराज्य पे चलके आया उसने तुळजापूर काबिज किया पंढरपुर की तबाही कियी ऐसे बहुत हिन्दू धर्म के पवित्र जगहों की तबाही कियी गांव लुटे उसका प्रमुख हेतु था की छत्रपती शिवाजी महाराज को खुले जगह लेके आना पर छत्रपती शिवाजी महाराज अफजल खान का हेतु जानते थे उनको पता था की अफजल खान के सामने खुले युद्ध भूमि में युद्ध करना बहुत ही कठिन ओर धोकादायक है इसी कारन छत्रपती शिवाजी महाराज ने गनिमी कावा युद्ध तकनीक से जावळी घाटी के जंगल मे प्रतापगढ किला के परिसर में युद्ध करने का निर्णय लिया। कारण इस परिसर में अफजल खान की हाथी , ऊंट , घुड़सवार ओर बंदूक इनका प्रयोग करना बहुत कठिन था। छत्रपती शिवाजी महाराज ने अफजल खान को जावळी घाटी में बुलाया। अफजल खान की सिर्फ १२,००० सैनिक ही जावळी घाटी तक पहुंच सके। दिनांक १० नवंबर १६५९ पर छत्रपती शिवाजी महाराज ओर अफजल खान की मिलने की जगह ओर समय तय हुवा। दोपहर को २ बजे छत्रपती शिवाजी महाराज ने अफजल खान का वध किया ओर अफजल खान की फौज का गनिमी कावा युद्ध तकनीक से मराठो के फौज ने पराभव किया। अफजल खान को मारनेके बाद छत्रपती शिवाजी महाराज को ओर मराठी जित को बड़ा प्रताप मिल गया इसी कारन इस किले का नाम प्रताप गड रखा गया।
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| Pratapgad Fort |
प्रतापगड किले पर बालेकिले मे छत्रपती शिवाजी महाराज का रहनेका राजवाड़ा था उसे ब्रिटिशोंने तोड़ दिया था। अभी उस जगह पर अभ स्टेचूगार्डन है यहाँ पर छत्रपती शिवाजी महाराज का कृष्णा घोड़ी पर बैठे हुवे अश्वारूढ़ मूर्ति है। यह मूर्ति पंच धातु से बनाया गया है इस मूर्ति की रचना मूर्तिकार रामचंद्र पांडुरंग कामत (विले पार्ले) इनकी सहयोग से बनाया गया है। इस मूर्ति का कुल वजन ४५० टन इतना है। यह मूर्ति १७ अलग अलग पार्ट में बनाया गया है। यह १७ अलग पार्ट यहाँ लाकर आपस में जोड़े गए है। इस मूर्ति की कुल उचाई नींव से ३६ फुट इतनी है ओर घोड़ी से लेकर तलवार की नोक तक कुल १६ फुट है। इस मूर्ति के बाजुमे तोपे रखी गयी है। इस मूर्ति का उद्घाटन ३० नवंबर १९५७ में भारत के पहले प्रधान मंत्री पंडित जवाहलाल नेहरू के हस्ते किया गया था। इस मूर्ति के निचे कुछ ऐतिहासिक वाक्य मराठी भाषा में लिखे गये है उनका हिंदी में अनुवाद इस प्रकार।
छत्रपती शिवाजी महाराज का मोगल अधिकारीयोको पत्र
"मेरे माय भूमीका रक्षण यह मेरा परम कर्तव्य है इस भूमी पर आक्रमण करने वाला कोही भी हो कभी भी सफल नही हुआ"
पोर्तुगीज गव्हर्नर गोवा इ.स. १६६६
"शिवाजी महाराज का शौर्य ओर कर्तृत्व इतना बड़ा है की उनकी तुलना जगज्जेता अलेक्झांडर से ही हो सकती है"
छत्रपती शिवाजी महाराज का आज्ञा पत्र
"मेरे माय भूमीका रक्षण यह मेरा परम कर्तव्य है इस भूमी पर आक्रमण करने वाला कोही भी हो कभी भी सफल नही हुआ"
पोर्तुगीज गव्हर्नर गोवा इ.स. १६६६
"शिवाजी महाराज का शौर्य ओर कर्तृत्व इतना बड़ा है की उनकी तुलना जगज्जेता अलेक्झांडर से ही हो सकती है"
छत्रपती शिवाजी महाराज का आज्ञा पत्र
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| Chatrapati Shivaji Maharaj Aadnyapatra |





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